Ambedkar life story: बाबा साहब अंबेडकर का जीवन कभी भी आसान नहीं रहा.. उन्हें हर लक्ष्य को पाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता था। ऐसा लगता था मानों कि उनका जन्म एक अछूत जाति में इसी लिए हुआ था कि ताकि वो संसार को ये बता सकें कि भले ही अछूत होने के कारण उनके रास्ते में तमाम बाधायें आयेंगी लेकिन संघर्ष और ढृढ़ निश्चय के दम पर जातिवाद की बेड़ियां तोड़ी जा सकती है। शिक्षा की बदौलत समाज में बराबरी का हक पाया जा सकता है.. विदेशों में शिक्षा हासिल करने का उनका लक्ष्य भी इसीलिए अहम था ताकि वो संदेश दे सकें, कि शिक्षा ही वो एकमात्र रास्ता है, जिसके दम पर जातिगत भेदभाव को खत्म किया जा सकता है।
अब विदेश में रहकर भी किया संघर्ष
लेकिन विदेशों में भी उनका संघर्ष ऐसा था जो किसी को भी हार मानने पर मजबूर कर सकता था लेकिन बाबा साहब कई कई दिनों तक भूखे रहते, ठंड में उनके घिस चुके जूतों के कारण पैरों में सर्द कंपकपांहट महसूस होती थी, मगर वो नहीं रूके.. हालांकि एक वक्त ऐसा था जब भूख से तड़पते हुए बाबा साहब साहब की हिम्मत जवाब दे गई थी.. और वो फूट फूट कर रो पड़े थे। अपने इस लेख में हम बात करेंगे बाबा साहब के इस संघर्ष की, जब बाबा साहब की हिम्मत पहली बार जवाब दे गई थी।
लंदन में बाबा साहेब का संघर्ष
ये समय था 1920 के दशक की शुरूआत का, जब बाबा साहब अंबेडकर फिर से लंदन पहुंचे थे अपनी पीएचडी और वकालत की शिक्षा को पूरा करने के लिए। बाबा साहब लंदन के टन किंग हेनरी रोड पर एक छोटे से कमरे में किराये पर रहते थे। लंदन की हड्डियां कंपा देने वाली ठंड में जहां लोग अपनी अपनी रजाइयों में दुबके हुए थे, वहीं अपनी आंखो में दलितों को बराबरी का हक दिलाने की आग अपनी आंखो में लिए किताबों के हुजुम के बीच बैठे थे बाबा साहब.. उनके टेबल पर चारों तरफ किताबें रखी थी, और उनकी नजरे भी एक किताबें पर गड़ी हुई थी।
अमेरिका से लौटने के बाद बड़ौदा रियासत में नौकरी
उस वक्त वहां का माहौल ऐसा था मानो टन किंग हेनरी रोड के उस छोटे से कमरे में दुनिया भर का ज्ञान समाया हुआ हो.. बाबा साहब ने अमेरिका से लौटने के बाद फिर से बड़ौदा रियासत में नौकरी शुरु कर दी थी, लेकिन उनकी शिक्षा की भूख भी शांत नहीं हुई, कुछ सालों के बाद अपनी जमा पूंजी को इकट्ठा कर वो लंदन चले गए.. लेकिन विड़बना ये थी कि जो कोर्स एमएससी-डीएससी और बार एट लॉ को बाबा साहब ने चुना था उसे पूरा होने में कम से कम 6 से 8 साल लगने थे, लेकिन बाबा साहब के पास मात्र 2 साल तक के ही लंदन में रहने के पैसे थे।
यानि की उनके पास समय भी कम था और पैसे भी.. मगर बाबा साहब का निश्चय पक्का था.. उन्होंने हर दिन 16 से 18 घंटे तक पढ़ने का निश्चय किया… बाबा साहब खाने से ज्यादा किताबों में खर्च करना पसंद करते थे, लेकिन भूख से जंग कब तक लड़ी जा सकती थी, पढ़ने के लिए भी शरीर में ताकत चाहिए थे.. मगर एक रात ऐसी आई जब बाबा साहब की हिम्मत ने भूख के आगे हार मान लिया था।
भूख से जंग और आँखो से निकले आंसू
बाबा साहब को किसी तरह से अपना कोर्स पूरा करना था, जिसके लिए उन्होंने पैसो को बचाने के लिए कुछ बड़ी कटौती शुरु कर दी। वो बस से चलने के बजाये पैदल चलते, शरीर पर न तो एक अच्छा ऑनर कोट था और अच्छे जूते, लेकिन वो उसे पहन कर ठंड को बर्दाश्त कर रहे थे, मगर कटौती तो सबसे ज्यादा उन्होंने अपने खाने पीने में की थी। बाबा साहब अपना ज्यादातर समय ब्रिटिश म्यूजियम लाइब्रेरी में गुजारते थे.. और बाकि का समय वो अपने कमरे पर रह कर पढ़ते थे। जिस कमरे में वो रहते थे।
उनकी लैंडलेडी अक्सर उन्हें खाने पीने के लिए कुछ न कुछ दे देती थी, जिसे वो बचा लिया करते थे, उस दिन भी उन्होने मकान मालकिन की दी हुई रोटी, ब्रेड औऱ मछली को बचा लिया था..ताकि वो रात में खा सकें.. मगर जब उन्होंवे लंच बॉक्स खोला तो ठंड के कारण रोटी और ब्रेड दोनो की अकड़ चुके थे।
स्टोव जलाया तो रोटी जल गयी
बाबा साहब जानते थे कि ये रोटी खाने लायक नहीं बची थी, लेकिन बाबा साहब उसे फेंक नहीं सकते थे, वो उनके उस रात का खाना था, बस बाबा साहब ने स्टोव जलाया.. बाबा साहब के पास समय कम था, इसलिए वो समय बर्बाद नहीं कर सकते थे, एक हाथ में किताब लेकर वो दूसरे हाथ से रोटी सेंकने लगे, लेकिन थोड़ी देर बाद जब उनका ध्यान किताब से ध्यान टूटा तो उन्होंने देखा कि न केवल रोटी जल गई है बल्कि उनका हाथ भी हल्का सा झुलस गया था.. उन्हें दर्द हुआ लेकिन उससे ज्यादा तकलीफ इस वक्त उन्हें भूख से महसूस हो रहा था… ये वो पल था जब बाबा साहब अपनी लड़ाई को छोड़ कर वापिस लौट जाना चाहते थे।
बाबा साहेब की आंखो में आंसू
उनकी आंखो में आंसू आ गए थे.. न खाने लायक रोटी को भी वो खाने जा रहे थे लेकिन वो भी जल गई थी। बाबा साहब ने कुछ पल के लिए सोचा की आखिर वो अपने परिवार को भारत में गरीबी में छोड़कर किस लिए ये तपस्या कर रहे है, उन्हें वापिस चला जाना चाहिए.. लेकिन तभी बाबा साहब की नजर सामने रखी एक रिपोर्ट पर पड़ी.. जिसमें भारत में दलितो के साथ होने वाली अत्याचार और उनकी बदतर स्थिति के बारे में बताया गया था। बाबा साहब के अंदर फिर से वो आग जल उठी, उन्होंने आंसू पोछे और जली हुई रोटी को पानी के सहारे किसी तरह से निगल लिया।
बाबा साहब लाइब्रेरी में भी सुबह से शाम तक पढ़ते थे लेकिन कुछ नहीं खाते थे वो पानी पी कर रहते थे, उनके दिमाग में केवल ये रहता था कि उन्हें अपने लोगो के उत्थान के लिए कुछ करना है तो वो एक एक पल का इस्तेमाल करेंगे, बाहर लंच करने जाने के कारण उनका 1 घंटा बर्बाद हो जाता, और वो एक घंटा बर्बाद नही कर सकते थे..क्योंकि एक घंटे की बर्बादी उनके समाज को एक साल और पीछे ले जायेगा। बाबा साहब खाने की कमी के कारण कमजोर हो गए थे, लेकिन उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया था।
मात्र 2 साल 3 महीने में उन्होंने अपना कोर्स पूरा कर लिया था, और एक विजय मुस्कान के साथ वो लंदन से लौटे थे। वो जानते थे कि उन्होंने उस ताकत को हासिल कर लिया है जो उनके समाज को बराबरी का हक दिलायेगा, जो उन्हें सम्मान और समानता दिलाने वाला था। बाबा साहब के आंसू गिरे, उन्होंने कई बार हार मानी लेकिन वो फिर खड़े हुए.. लड़े और विजयी हुए.. शायद इसीलिए बाबा साहब संविधान शिल्पीकार भारत रत्न बने। उनके इस संघर्ष को हमारा सलाम।



