Top 5 Dalit News: सत्ता, जातिवाद और अपमान… दलित नेताओं की मजबूरी की 5 बड़ी खबरें

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Top 5 Dalit News: जरा सोचिये, अगर दलित नेताओ के पास गद्दी होभी तो क्या वो वाकई में उसका सही इस्तेमाल कर पाते है या नहीं। बाबा साहब ने दलितों को राजनीति में बराबरी तो दिलवा दी, लेकिन वो राजनीति के अंदर जातिवाद के श्राप को नहीं रोक सकें जो तमाम दलित नेताओं को रोज अपमानित करता है और दलित नेता मजबूरी में मौन स्वीकृति देने के लिए विवश है। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितों के साथ होने वाले घटनाओं के बारे में बतायेंगे, जो साक्षी है इस बात का कि केवल गद्दी मिलने से ताकत नहीं मिलती, दलित आज भी कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं समझे जाते।

कर्नाटक की राजनीति फिर से गरमाई

1, दलितों से जुड़ा पहला मामला कर्नाटक से है, जहां पिछले कुछ समय से दलित सीएम को मांग को लेकर राजनीति में बड़ा भूचाल आया हुआ है, सत्तारूढ़ कांग्रेस  तमाम विरोधों और माँगो के बाद भी सत्ता की गद्दी एक दलित सीएम को देने के लिए राजी नहीं हो रहे है। दलित सीएम की मांग को फिर से उठाया है विधान परिषद के विपक्ष के नेता चालवाड़ी नारायणस्वामी ने.. जिन्होंने कांग्रेस पार्टी के सभी दलित नेताओं से आग्रह किया है।

उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार

उन्होंने सीधे तौर पर कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस ने दलित नेताओं को इस कदर दबा दिया है कि वो एक बीजहीन अस्तित्व वाले नेता बन कर रह गए है जो अपने हक की आवाज भी नही उठाते।उन्होंने दलित नेताओं को बीजेपी में शामिल होने का ऑफर देते हुए कहा कि कांग्रेस हाइकमान अगर उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नाम पर मुहर लगाती है तो हमें कोई परेशानी नहीं है लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो दलित नेताओं को कैबिनेट के अन्य पदों का बहिष्कार करना चाहिए।

कांग्रेस के लिए दलित हमेशा वोट बैंक से ज्यादा कुछ नहीं रहे है.. तभी आज तक इतना हंगामा होने के बाद भी अब तक दलित सीएम की मांग पर कांग्रेस का रूख बेहद उदासीन है। ऐसे में देखना ये होगा कि क्या मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के इस्तीफा देने के बाद दलित सीएम बनाने पर कोई फैसला होगा, या दलित सीएम के लिए लड़ाई जारी रहेगी। आपको क्या लगता है क्या ये इतना आसान होगा।

दलित होने के कारण परिक्षा में नहीं बैठने दिया गया

2, दलितो से जुड़ा अगला मामला मध्य प्रदेश के अमरकंटक से है, जहां जातिवादि मानसिकता के कारण एक दलित छात्र को परिक्षा में नहीं बैठने दिया गया। जिसके कारण वो छात्र पिछले 5 दिनों से धरने पर बैठा है लेकिन हैरानी की बात है कि अब तक प्रशासन की आंखे ही नहीं खुली.. ये मामला इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक का है, पीड़ित छात्र का धरना करते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है, जिसमें छात्र गले में हांडी लिए, हाथ में संविधान पकड़े हुए और कमर पर झाड़ू बांधे धरना दे रहा है।

पीड़ित ने बताया कि विभाग के HOD ने उसे ये कह कर परिक्षा में बैठने नहीं दिया कि तुम देशद्रोही हो, आतंकवादी हो, यूनिवर्सिटी में दंगा फसाद फैलाते हो। जबकि छात्र के नाम से कभी कोई शिकायत तक दर्ज नहीं की गई.. वो तो केवल वहां पढ़ना चाहता था, अपने समाज के लिए, अपने लोगो के लिए कुछ करना चाहता था, लेकिन मनुवादि मानसिकता वालों के लिए एक दलित का पढ़ना कभी पचाने वाला मुद्दा रहा ही नहीं।

हैरानी की बात है कि छात्र को 5 दिन हो गए है धरना करते हुए, लेकिन न तो प्रशासन की तरफ से और न ही कॉलेज की तरफ से किसी ने छात्र की सुध लेने की कोशिश की.. तो जरा सोचिये, ऐसे में ये छात्र किससे न्याय की उम्मीद करेंगे, कोई सिस्टम के खिलाफ नहीं जाता, उन्हें मजबूर कर दिया जाता है… आपकी इस पर क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

यूपी में जंगलराज, नगीना सांसद को मारने की धमकी

3, दलितो से जुड़ा अगला मामला भीम आर्मी चीफ चंद्र शेखर आजाद को लेकर है, ऐसा लगता है कि जैसे यूपी अब भारत से अलग ही है, क्योंकि यहां न तो संविधान का कानून चलता है औऱ न ही जातिवादियों को संविधान का कोई सम्मान है। तभी तो एक सांसद को सरेआम राज्य के दूसरे हिस्से में जाने की बात पर सरेआम पीटने की, जानलेना हमला करने की धमकी दी जा रही है लेकिन कार्यवाई के नाम पर जीरो बटे निल है। एक तरफ आजाद की बढ़ती लोकप्रियता के कारण पूर्व IPS आदित्य प्रकाश वर्मा ने आसपा जॉइन करके 2027 में हाथरस सीट के चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है।

तो वहीं करणी सेना के लोग लगातार आजाद को धमकी दे रहे है कि वो अपनी सत्ता परिवर्तन यात्रा लेकर मथुरा न आये, क्योंकि अगर वो आये तो अपने पैरो पर नहीं बल्कि हॉस्पीटल के स्ट्रेचर पर जायेंगे। यूपी में आखिर कानून चलती किसकी है.. संविधान का, या ये चंद मनुवादी आतंकियों का.. हैरानी की बात है कि ये लोग सरेआम जान से मारने की धमकी देते है.. लेकिन इन्हें प्रशासन और पुलिस का डर क्यों नहीं है.. सोचने वाली बात है कि जब सांसद के साथ ऐसी स्थिति है तो आम नागरिक के साथ क्या ही होता होगा.. फिर कहते है कि यूपी में दलित उत्पीड़न कम हुआ है.. क्या आपको वाकई में सरकारी आकड़ो पर भरोसा है.. जवाब हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

झुंझुनू में पुरानी रंजिश के चलते दलित के साथ बर्बरता

4, दलितों से जुड़ा अगला मामला राजस्थान के झुंझुनू का है। जहां पुरानी रंजिश निकालने के लिए एक दलित युवक के साथ मानवता की सारी हदें पार कर दी गई। ये मामला झुंझुनू के गुढ़ागौड़जी थाना क्षेत्र के खींवासर गांव का है, पीड़ित ने पुलिस को तहरीर दी कि वो शाम के समय गांव के दुकान पर कुछ सामान लेने गया था, लेकिन तभी वहां गांव का राकेश दड़िया वहां ट्रेक्टर ले कर आ गया। उसने बात करने के बहाने जबरन ट्रेक्टर पर बिठाया और सुनसान जगह पर ले गया। जहां पहले तो उसने जबरन कपड़े उतरवाये ताकि वो भाग न सकें, फिर उसे शराब पीने पर मजबूर किया।

जिसके बाद पीड़ित को बुरी तरह से पीटा औऱ उसकी सोने की चैन औऱ नगदी लूटी..लेकिन जब आरोपी का दिल इतने से भी नहीं भरा तो पीड़ित को ट्रेक्टर से बांध कर घसीटा, और बुरी तरह से घायल अवस्था में छोड़ कर फरार हो गया। पीड़ित ने किसी तरह से घरवालो को सूचना दी। पीड़ित की तहरीर पर जब पुलिस ने छानबीन शुरु की तो आऱोपी राकेश दड़िया पकड़ा गया और उसने इस अपराध को स्वीकार भी कर लिया है।  पुलिस अब आगे की जांच कर रही है.. अब देखना ये होगा कि सारे सबूत होते हुए भी पीड़ित को न्याय कब तक मिलेगा।

दलित ईसाइयों पर आंध्र प्रदेश सरकार का कड़ा रूख

5, दलितों से जुड़ा अगला मामला आंध्र प्रदेश से है, जहां काफी लंबे समय दलित इसाईयों के एससीएसटी लाभ के लिए लड़ने वाली लड़ाई को खत्म करने के लिए सरकार ने आखिरी मुहर लगा दी है। मार्च में जहां पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि दलित ईसाइयों को परिवर्तन के बाद एससी एसटी के कोई लाभ नहीं मिलेंगे, लेकिन तब भी दलित ईसाइयों ने अपनी लड़ाई जारी रखी थी, लेकिन सबकी आखिरी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए अब आंध्र प्रदेश सरकार ने कड़ा रूख अपनाया है औऱ बापटला जिले के पादरी चिंतदा आनंद का अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र रद्द कर दिया है।

बता दें कि जिला स्तरीय जांच समिति ने खुद इसकी सिफारिश की थी। पादरी को 2021 और 2025 के बीच तीन जाति प्रमाण पत्र जारी किये गए थे, जिसे एक साथ रद्द कर दिये गए है। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रूख के बाद ये साफ हो गया है कि संवैधानिक तरीके से दलितों को ईसाइ बनने पर कोई लाभ नहीं मिलने वाला है.. ऐसे में देखना ये होगा कि क्या इससे दलितों का ईसाइ बनने का सिलसिला रूकेगा।

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