Top 5 Dalit news: जब सरकार कहती है सबका साथ सबका विकास हो, तो ऐसा लगता है कि उन सबमें दलित शामिल ही नहीं होते है.. क्योंकि दलित कहीं के भी भेदभाव तो सहना ही है.. जब सवर्ण की बात होती है तो उनके सौ खून माफ, लेकिन दलितों का आवाज उठाना भी मनुवादियों के कानों में चुभने लगता है। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितों के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में बताते है जो इस वक्त शोसल मीडिया पर काफी वायरल हो रही है।
दिल्ली में अतिक्रमण हटाओ मुहिम पर रोक
1, दलितों से जुड़ी अगली खबर दिल्ली से है, लेकिन इस बार दलित भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के है। जी हां, राजधानी दिल्ली में पिछले कुछ महीनों से अतिक्रमण हटाने की मुहीम जारी है, जिसके तहत दिल्ली के सिग्नेचर ब्रिज के पास मजनूं का टिला इलाके में रहने वाले सैकड़ो पाकिस्तानी दलित परिवारों को विस्थापित किया जाना था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इनके विस्थापन पर रोक लगाते हुए दिल्ली सरकार से 4 हफ्ते के अंदर जवाब मांगा है।
दरअसल यहां रहने वाले करीब 250 दलित परिवारों को भारत की नागरिकता मिल चुकी है, लेकिन फिर भी बिना उचित आवास के उन्हें विस्थापन का खतरा सता रहा है, जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह ने सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार को आदेश दिया है कि जब तक यहां रहने वाले 250 परिवार जिनमें करीब 1000 लोग है, उनके लिए उचित और स्थाई निवास मुहैया नहीं होता है तब तक उन्हें विस्थापित नहीं किया जा सकता है।
ये लोग कई सालो से इस इलाके में रह रहे है, और अब भारतीय नागरिक बन चुके है, ऐसे में उनके साथ भेदभाव करना उचित नहीं है। ये वो दलित समुदाय है जो पाकिस्तान में प्रताड़ना झेल कर भारत की शरण में आये है, उनके साथ यहां शरणार्थियों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता है। अब दिल्ली सरकार को कोर्ट को जवाब देना होगा कि विस्थापित करने के बाद सरकार के लिए दलितों को लिए क्या उचित प्रबंध है।
घोड़ी चढ़ने पर दलित युवक पर तलवार से हमला
2, दलितों से जुड़ा अगला मामला गुजरात के पाटन से है, जहां घोड़ी चढ़ने पर दलित समाज से आने वाले एक दूल्हे पर तलवार से हमला कर दिया गया। दलित समुदाय से आने वाले पीड़ित युवक विशाल चावड़ा ने पुलिस को तहरीर दी कि शादी से पहले उनके यहां शादी की बारात जिसे वरघोड़ा कहा जाता है, निकाली जाती है, रस्मों के हिसाब से वो विशाल भी घोड़े पर सवार होकर चांदरुमाना गांव की सड़कों से ले जा रहा था।
लेकिन तभी गांव के कुछ सवर्ण समाज के दबंगो ने उसका रास्ता रोका, और घोड़ी पर चढ़ने के कारण उस पर तलवार से हमला कर दिया, साथ ही परिवार के लोगो पर भी हमला कर दिया, जिससे कई लोग घायल हो गए,… ठाकुरो ने सीधे तौर पर धमकी दी कि दलित जाति से होकर घोड़ी पर चढ़ने की हिम्मत कैसे की, ये केवल ठाकुरों का अधिकार है।
पीड़ित की शिकायत के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरु कर दी है साथ ही गांव का माहौल न बिगड़े इसीलिए पुलिस बल तैनात कर दिया है। पुलिस ने अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया है, लेकिन पीड़ित परिवार इस घटना से डर के माहौल में है। हालांकि गुजरात में दलितों के साथ होने वाली ये घटनायें कोई नई नहीं है। लेकिन ये घटनायें बताती है कि राज्य में दलितों की स्थिति कितनी दयनीय है।
जातिगत जनगणना के खिलाफ दायर याचिका खारिज
3, दलितों से जुड़ी अगली घटना सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को लेकर है, जिसमें अगले साल होने वाले जनगणना में जातिगत जनगणना के खिलाफ हुई अपील पर कोर्ट ने सुनवाई करने से ही इंकार कर दिया है। दरअसल एससी ने तय किया था कि 2027 में होने वाली जनगणना में नागरिकों की जाति दर्ज करने, क्लासीफिकेशन करने और सत्यापन करने का नियम तय किया गया है, लेकिन इस फैसले के खिलाफ शिक्षाविद आकाश गोयल ने एक पीआईएल दायर की थी, लेकिन चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करने से ही इंकार कर दिया।
बताते चले कि याचिका में कहा गया था कि जाति संबंधी आंकड़ों के संग्रह, वर्गीकरण और सत्यापन के लिए जो सवाल किये जायेंगे और जो प्रक्रिया होगी..उसे सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे, लेकिन कोर्ट ने इस याचिका को निराधार बताते हुए कहा कि अभी तक ऐसे कोई डाटा ही मौजूद नहीं है जिससे जाति की सही पहचान हो सकें, इसलिए याचिका का आधार गलत है, हालांकि याचिका के कुछ बिंदुओ पर विचार करने के लिए कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिये है, औऱ उन्हें गणगणना में शामिल करने का भी सुझाव दिया है।
बीते कुछ समय से दलितों और पिछड़ो के साथ होने वाले भेदभाव और उनके लिए मिलने वालों लाभों को सही मात्रा में उन तक पहुंचाया जाये, इसके लिए कोर्ट ने इस बार जणगणना में जातिगत जनगणना करने का भी आदेश जारी किया है। अब देखना ये होगा कि कोर्ट के इस फैसले के बाद क्या वाकई में दलितों और पिछड़ो की स्थिति में कोई खास बदलाव आयेगा.. आप अपनी राय हमें जरूर बतायें।
सीकर में 40 दलित परिवारों के घर को खतरा
4, दलितों से जुड़ा अगला मामला राजस्थान के सीकर जिले से है, जहां पिछले 70 सालों से रह रहे 40 दलित परिवारों के घरों को अवैध बता कर सात दिनों के अंदर खाली करने का आदेश नगर विकास न्यास ने दिया है। ये खबर सीकर के चंदपुरा गांव का है, जहां एक पॉलिटेक्निक कॉलेज का निर्माण चल रहा है, वहीं चंदपुरा में 146 बीघा में कॉलोनी बसाने की योजना को भी हरी झंडी दी गई है, लेकिन जब इसके लिए गोचर भूमि की मार्किंग शुरू हुई तो करीब 70 सालों से रह रहे 40 दलित परिवारों के मकानों को भी यूआईटी कर्मचारियों ने अवैध बता कर मकान खाली करने का नोटिस जारी कर दिया है।
वहां रहने वाले ज्यादातर पीड़ित दलित परिवार मजदूरी करके किसी तरह से अपने परिवार को पालते है, ऐसे में अचानक उनके आशियाने उजड़ जाएंगे तो वो कहां जाएंगे, अब उन्हें इसका ही डर सताने लगा है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि जानबूझ कर केवल दलित होने के कारण उन्हें ही निशाना बनाया गया है। उन्होंने प्रशासन से अनुरोध किया है कि वो उनके घरों को न उजाड़े। वो कर जाएंगे लेकिन घर नहीं टूटने देंगे। घरों को तोड़ने से पहले उनके लिए रहने का बंदोबस्त कराया जाए। ऐसे में देखना ये होगा कि ग्रामीणों की पुकार क्या प्रशासन तक पहुंच भी पाएगी, या गरीब दलितों को अपने ही घरों को आंखों के सामने टूटते देखना होगा।
यूजीसी के नये नियमों को लागू करने के लिए दलितों का आंदोलन
5, दलितों से जुड़ा अगला मामला यूजीसी के नये नियमों के खिलाफ होने वाले प्रदर्शन को लेकर है, पहले सवर्ण समाज वाले इसे रोकने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसपर रोक लगा दी, वहीं अब इसे फिर से लाने के लिए दलित और बहुजन समाज भारी संख्या में सड़कों पर उतर गया है, लेकिन यहां पुलिस और प्रशासन का दोहरा चेहरा देखने को मिला.. जब सवर्ण लोग विरोध कर रहे थे, UGC के नए प्रावधान के विरोध में प्रधानमंत्री मोदी को गालियाँ दी जा रही थी।
उनके पोस्टरों पर चप्पल-जूते मारे गए और “मोदी तेरी कब्र खुदेगी जैसे नारे लगाये गए..जिनका वीडियो खूब वायरल भी हुआ, तब भी प्रशासन नींद से नहीं जागी..किसी एक की भी गिरफ्तारी तो छोड़िये उन्हें रोका तक नहीं गया, लेकिन वहीं जब दलितों ने आंदोलन शुरु किया तो पुलिस उन्हें जबरन उठा कर उठा कर गिरफ्तार कर रही है, उनपर झूठे आरोप लगाये जा रहे है। दलितों के साथ होने वाला ये भेदभाव बताता है कि यूजीसी के नए नियम शायद कहीं न कही हांथी के दांत ही थे
जो खाने के और दिखाने के और थे। नियमों को लागू करके दिखाया गया कि बीजेपी सरकार दलितों की हितैषी है, लेकिन तुरंत स्टे लग गया, सवर्णों पर कोई कार्यवाई नहीं हुई, और दलितों को जेल में डाला गया.. जिससे सरकार की मंशा साफ हो जाती है, सरकार कभी चाहती ही नहीं थी कि यूजीसी के नए नियम लागू हो।



