Shudra in Purusha Suktam: क्यों वेद के पुरुष सूक्तम में पृथ्वी को शूद्र की उपाधि दी गई है, क्यों वेदो में कहा गया है पूरी पृथ्वी शूद्रो के ही सामान है?

Shudra Purusha Suktam
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Shudra in Purusha Suktam: हिंदू धर्म में ब्राह्मणी वर्ण व्यवस्था सदियो से चली आ रही है, जिसके आधार पर ही जातिवाद की उत्पत्ती हुई.., और जाति के आधार पर लोगो के बीच में बंटवारा हुआ। हालांकि जब आप ऋग्वेद पड़ते है तो आपको बता चलता है कि चारों वर्ण, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र शामिल है, उनका बंटवारा जाति के आधार पर नहीं बल्कि उनके किये गए कार्यो के आधार पर होता था, लकिन समय के साथ कई बड़े बदलाव हुए और ये जाति का आधार ही बन गया..

जांघो से वैश्य वर्ण और पैरों से शूद्र वर्ण का जन्म हुआ

चारों वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति के जनक हिंदू धर्म में रचयिता ब्राह्मा को कहा जाता है, जिनके मुख के ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय वर्ण, जांघो से वैश्य वर्ण और पैरों से शूद्र वर्ण का जन्म हुआ था। जहां ब्राह्मणों को ज्ञान और शिक्षा के आधार पर चयनित किया जाना था, तो वहीं जो रक्षक होगा वो क्षत्रिय और, जो व्यापार करेगा, खेती करेगा वो वैश्य कहलायेगा साथ ही जो श्रम और सेवा करेगा उसे शूद्र कहा जाना चाहिए था,… लेकिन इसे पूरी तरह से अलग कर के प्रेजेंट किया गया… मगर एक विषय ऐसा भी है जिसपर ब्राह्मण चर्चा तक नहीं करते।

वो ये है कि पृथ्वी का शूद्र कहलाना.. ये तो आप सभी जानते होंगे कि शूद्र जिस धरती पर रहते है वहां उंचे कुल के लोग पांव भी नहीं रखते थे, ऐसे में ये स्वीकार करना ही ऋग्वेद में पृथ्वी को शूद्र कहा गया तो भला वो कैसे स्वीकार करते..फिर उनकी जातिवादी मानसिकता कैसे विजय होती… अपने इस वीडियो में हम बात करेंगे कि आखिर क्यों पृथ्वी को शूद्र कहा गया था..और क्यों नहीं किया गया इसे स्वीकार..

क्या कहता है ऋग्वेद का पुरुष सूक्तम?

ऋग्वेद के 10.90 में विराट पुरुष का जिक्र किया गया है। जिसमें जहां वर्ण व्यवस्था को बांटने का आधार बताया गया है वहीं इस पुरुष सुक्त में पृथ्वी को लेकर भी कहा गया कि पृथ्वी भी शूद्र ही वर्ण की है, क्योंकि विराट पुरुष के नाभी से अंतरिक्ष की उत्तपत्ति हुई है माथे से देवलोक उत्पन्न हुआ है तो वहीं चरणों से ही पृथ्वी की उत्तपत्ति हुई है। पृथ्वी ही जीवन का आधार है, जो हमें जीवन जीने के लिए जल, भोजन, हवा, अग्नि सभी तत्व देती है.. जो हमारा पालन पोषण करती है।

जबकि पृथ्वी को हम माता के समान मानते है, पृथ्वी की आंखे हम सूर्य को कहते है, जिसका मन चंद्र की तरह की शीतल है। समस्त संसार के अच्छे बुरे, सभी चीजो को धारण करने वाली पृथ्वी असल में शूद्र है…जो हर एक जीवित मृत प्राणी के जीवन का आधार है..तो जब पृथ्वी पूजनीय है, पृथ्वी सबसे श्रेष्ठ है तो फिर शूद्र वर्ण नीच कैसे हो गए। वो कैसे अछूत की श्रैणी में आने लगे, वो कैसे अलग थलक कर दिये गए.. आखिर क्या है कारण..

शूद्र वर्ण को नीच बताया गया

कारण साफ है कि जिस ऋग्वेद में विराट पुरुष के पैरो से उत्पन्न होने के कारण शूद्र वर्ण को नीच बताया गया वहीं पृथ्वी को श्रेष्ठ कैसे बना दिया गया.. अगर आप आकलन करें तो जिन लोगो के पास शिक्षा का आधार था, उन्होंने वेदों पुरानों के ज्ञान का इस्तेमाल अपनी सहूलियत के हिसाब से किया होगा.. और जब उन्हें लगा होगा कि अगर शूद्र वर्ण के लोग पढ़ने लगे तो उनका झूठ सामने आ जायेगा.. तो उन्होंने वेदो पुराणों के नाम पर लोगो को भड़काने और बरगलाने का काम किया होगा..जिससे शूद्र धीरे धीरे कमजोर, अनपढ़ और अलग थलग होते गए।

समय के साथ वर्ण व्यवस्था जाति का आधार पर बन गया..उनके लिए जो कार्य करने पर वर्ण चुना जाता था, वो धीरे धीरे विलुप्त हो गया.. और वर्ण व्यवस्था के साथ जातिगत भेदभाव की पहचान बन गई, जो कई सदियों से चली आ रही है, और समय के साथ जीवन का हिस्सा बन गई.. सच तो ये है कि आज का पढ़ा लिखा समाज भी इस बारे में जानने की कोशिश ही नहीं करना चाहता है कि शूद्र है कौन आखिर.. और पृथ्वी और शूद्रों की समानता से भी उन्हें अवगत नहीं कराया गया।

ताकि उन्हें अपनी श्रेष्ठता का कभी आभाष ही न हो..लेकिन सच्चाई तो ये ही कि जो सेवा करता है…जो त्याग करता है.. सही मायने में वहीं श्रेष्ठ है.. जैसे पृथ्वी हो या शूद्र..दोनो ही त्याग करते है, सेवा करते है..इसलिए दोनो ही असल में श्रैष्ठ है..आप पृथ्वी और शूद्रों के एक साथ श्रेष्ठ होने को लेकर क्या सोचते है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

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