Chhattisgarh High Court का बड़ा फैसला बिना जाति प्रमाणपत्र के गालियां देने अपराध नहीं, अपराध साबित करने के लिए देना होगा प्रमाणपत्र

Chhattisgarh High Court Judgment
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Chhattisgarh High Court: हाल ही में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से एक अहम खबर सामने आई है। कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि SC/ST एक्ट के प्रावधानों को लागू करने के लिए, पीड़ित के पास एक वैध और असली जाति प्रमाण पत्र होना अनिवार्य है; केवल SC/ST श्रेणी से संबंधित होने का दावा करना ही काफी नहीं है।

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न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास को अहम फैसला

आप दलित हैं और अगर आपको न्याय चाहिए तो सिर्फ आपका दलित होना ही काफी नहीं है बल्कि आपके पास सरकारी कागज का होना भी अनिवार्य है, वरना न्याय नहीं मिलेगा..दरअसल छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले ने पूरे देश में एक नई बहस छेड़ दी है, कोर्ट ने कहा है कि बिना ‘ठोस जाति प्रमाण पत्र’ के, SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।

दरअसल, यह मामला सरकारी ज़मीन पर एक दुकान के निर्माण को लेकर हुए विवाद से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि कहा-सुनी के दौरान, जातिसूचक गालियों का इस्तेमाल करके उसे अपमानित किया गया। इसके अलावा, शारीरिक हमले और जान से मारने की धमकियों के आरोप भी सामने आए। पुलिस ने IPC की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है। वही न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास (Justice Narendra Kumar Vyas) की पीठ ने एक 21 साल पुराने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यदि पीड़ित के पास वैध प्रमाण पत्र नहीं है, तो जातिसूचक गालियां देना SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध नहीं माना जाएगा…कोर्ट ने आरोपी पर सिर्फ अश्लील भाषा (धारा 294) के तहत 2000 रुपये का जुर्माना लगाया और मामला रद्द कर दिया।

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तकनीकी प्रमाण होना जरूरी

हैरानी की बात तो ये हैं कि 21 साल तक मामला चला, और आखिर में न्याय का आधार बना एक दस्तावेज कानून कहता है कि किसी को सजा देने के लिए पीड़ित की श्रेणी का तकनीकी प्रमाण होना जरूरी है। लेकिन सवाल वही है कि क्या न्याय सिर्फ कागजों का मोहताज है?.. कोई भी अपराधी जब किसी दलित पर अत्याचार करता है या जातिसूचक गाली देता है, तो क्या वो पहले उसका प्रमाणपत्र चेक करता है।

जातिवाद की मानसिकता तो जन्म लेते ही समाज में घर कर जाती है, ऐसे में, अत्याचार के वक्त जाति ‘निश्चित’ होती है, लेकिन न्याय के वक्त उसे प्रमाणित करने के लिए कागजों की लंबी लाइन में खड़ा होना पड़ता है। क्या यह फैसला दोहरी मानसिकता को बढ़ावा नहीं देता? क्या मानसिकता की सजा कागजी सबूतों से तय होनी चाहिए? छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के इस फैसले पर आपकी क्या राय है? क्या ये न्याय है या सिर्फ कानूनी प्रक्रिया?

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