Vinod Suryavanshi: फेमस पंचायत एक्टर विनोद सूर्यवंशी के साथ हुआ था जातिगत भेदभाव, खुद सुनाई अछूत समझे जाने की आपबीती

Vinod Suryavansi, Caste discrimination with Actor
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Vinod Suryavanshi: सोशल मीडिया पर इस वक्त एक मुद्दा काफी ज्वलनशील हो रहा है, एक कलाकार जो अपनी अदाकारी से लाखों लोगो के दिलो में बसता है क्या उसे भी जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है, जी हां, पंचायत series में अपनी एक्टिंग से फैंस को हंसाने वाले एक्टर विनोद सूर्यवंशी ने पहली बार शेयर किया है…अपने साथ हुए जातिगत भेदभाव की वो घटना, जिसने आज भी उनके दिल पर एक कभी न मिटने वाला दाग छोड़ा हुआ है।

Vinod Suryavanshi ने सुनाई जातिगत भेदभाव आपबीती

बचपन से मुम्बई में रहने वाले विनोद सूर्यवंशी ने कभी नहीं सोचा था कि अपने गांव की जिस मिट्टी से उनके पिता इतना प्यार करते है वहीं मिट्टी उन्हें इस हद तक अपमानित महसूस करा सकती हौ.. इसका खुलासा खुद विनोद सूर्यवंशी ने किया है कि कैसे एक पढ़े लिखे समाज से आने के बाद भी उनकी जाति आड़े आ गई.. और उनकी उम्मीदों से परे उन्हें न केवल जातिगत भेदभाव झेलना पड़ा.. बल्कि उन्हें अपने सामने पिता को जूठे बर्तन धोते हुए भी देखना पड़ा.. अपने इस लेख में हम जानेंगे कि कैसे विनोद सूर्यवंशी जैसे मंझे हुए कालकार को सहना पड़ा अपने ही गांव में जातिगत भेदभाव और अपमान..

विनोद सूर्यवंशी ने हाल ही में अपने एक्टिंग से पहले की जिंदगी के बारे में बात की थी, पंचायत 3 में नए सचिव जी बन कर दर्शको को गुदगुदाने वाले नये सचिव जी की रियल लाइफ काफी दुख-तकलीफ़ों से भरी रही है। उन्होंने बताया कि उनका परिवार काफी गरीबी में पला बढ़ा है, उनके पिता राजमिस्त्री का काम किया करते थे और उनकी मां घरो में झांड़ू पोछा लगाने का काम करती थी..बचपन से भले ही अभावो में जिये लेकिन अपनी मेहनत के दम पर आज वो बेहतर पॉजीशन पर है लेकिन सच तो आज भी यहीं है कि उससे उनके साथ होने वाली जातिगत भेदभाव में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है।

जातिगत भेदभाव के कारण दुत्कारे गए

वो कर्नाटक से आते है जहां उनकी जाति के कारण हमेशा वो दुत्कारे गए है। वहां आज भी दलितों की बस्ती अलग है और उंची जाती वालो की अलग.. दलितों की बस्ती मूल बस्ती से बिल्कुल अलग है। फिल्मों में आने से पहले विनोद एक गार्ड और लिफ्ट मैन के रूप में काम करते थे, जहां उन्हें घर चलाने भर तक के ही पैसे मिलते थे, … वहीं त्यौहारो में जहां सभी जगह खुशियां होती थी मैं कोसता था कि क्यों आये है त्योहार, क्योंकि हमारे पास त्योहार मनाने तक के पैसे नहीं होते थे… मेरी सफलता से भले ही लोगो को खुशी मिले..लेकिन मेरे परिवार के आँखो में राहत के आंसू थे.. जो उन्हें उस लाचारी से निकालने के लिए ही थे।

जब धोनी पड़ी जूठी थाली

विनोद ने बताया कि उनके गांव में जातिगत भेदभाव ऐसा है कि एक बार बचपन में जब वो करीब 8-9 साल के रहे होंगे तब वो अपने पिता के साथ गांव गए थे, जहां गांव के बाहर उन्होंने एक छोटे से होटल में खाना खाया था, लेकिन जब खाना खा लिया तो पिता दोनो की थाली धोने के लिए चले गए.. विनोद ने अपने पिता से पूछा कि जहां हर कोई जूठी थाली छोड़ दे रहा है तो आप क्यों धो रहे है, तो विनोद के पिता ने कहा कि हम छोटी जाति से है हमें अपने जूठे बर्तन धो कर ही जाना होगा। विनोद के लिए ये घटना काफी तकलीफ देह थी।

वहीं विनोद ने कहा कि आर्थिक सफलता पाने के बाद भी जातिगत भेदभाव कम नहीं हुआ.. आज भी गांव के मंदिर में उन्हें जाने की इजाजत नहीं है। शहरी इलाके में भले ही जातिगत भेदभाव में कमी आई हो लेकिन ग्रामीण इलाकों में कोई खास बदलाव नहीं आया है। विनोद ने कहा कि आपने अक्सर सुना होगा कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता है लेकिन सच तो ये है कि लोग आपको आपके काम से ही आंकते है, आपके काम और आपके पास कितने पैसे है उससे आपके स्टेटस को नापा जाता है।

काम और पैसा जितना ज्यादा होगा आपकी इज्जत भी उतनी ही ज्यादा होगी। विनोद का ये दर्द बताता है कि फैंस केवल किसी सितारे की सफलता और असफलता देखते है लेकिन उनके पीछे का स्ट्रगल अक्सर हम इग्नोर कर देते है। विनोद सूर्यवंशी भले ही एक स्टार बन गए हो लेकिन गांवों में उनकी पहचान से आज भी जाति है कि जाती नहीं..

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