बाबा साहब अंबेडकर एक ऐसी शख्शियत है जिन्होंने आजीवन बड़े बदलावों के लिए प्रयास किया.. उन्होंने दुनिया का सबसे लचीला संविधान लिखा और वो भी बिना किसी त्रृटि के… तो क्या आप सोच सकते है कि ऐसा शख्स भी कोई गलती कर सकता है। जिनका ज्ञान ऐसा था कि 9 भाषाओं को सीखा.. कुशाग्र बुद्धि के कारण 8 साल की पढ़ाई 2 साल 3 महीने में पूरी कर ली।
किताबों से प्यार था.. उन्हें ही दोस्त बना रखा था, अपने काम से काम रख कर केवल लक्ष्य को पूरा करने के लिए एकाग्रचुत रहते थे, फिर क्या ऐसा शख्स कोई गलती कर सकता है.. विश्वास ही नहीं होगा.. लेकिन सच यहीं है कि बाबा साहब ने भी 5 बड़ी गलतियां हुई थी. अपने इस लेख में हम बाबा साहब की वो 5 गलतियों के बारे में बात करेंगे, जिसका अफसोस कहीं न कहीं आज भी दलित समाज को होगा। आईये जानते है कि कौन ही से वो 5 बड़ी गलतियां।
पहली गलती- मृत बेटे को छोड़कर लंदन जाना
बाबा साहब ने इतने पढ़े लिखे थे, उन्हें कई बड़ी संस्थाओं में काम करने का मौका मिला था, लेकिन वहां भी जातिगत भेदभाव से वो कभी अछूते नहीं रहे थे। इसलिए कारण वो कही भी हमेशा परमानेंट होकर काम नहीं कर सकें। उन्होंने प्रोफेसर के तौर पर, वकील के तौर पर, यहां तक की प्रींसीपल के तौर भी उन्होंने काम किया था, लेकिन बावजूद इसके वो कभी भी आर्थिक तौर पर कभी इतने मजबूत ही नहीं हुए कि वो अपने मरते हुए बच्चो का अंतिम संस्कार करने के पैसे जुटा पाये। कहा जाता है कि पैसे की कमी के कारण बाबा साहब के 5 संतानों में से एक एक करके 4 संताने बचपन में ही स्वर्ग सिधार गई थी, जब उनके सबसे छोटे बेटे राजरतन की मौत हुई तो बाबा साहब के चेहरे पर एक पथरीली उदासी तो थी लेकिन आंखो में आंसू नहीं।
बच्चो को खो कर मां रमाबाई का कलेजा फट गया वो रोते हुए बाबा साहब से पूछने लगी कि किस काम की है उनकी वो डिग्रियां, जो उनकी संतान को नहीं बचा सकी। आपके समाज सुधार और ज्ञान के प्रति आपके पागलपन ने उनका घर उजाड़ दिया। लेकिन तब भी बाबा साहब ने बेटे के तेहरवी में शामिल होने के बजाय लंदन में गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने के लिए जाने लगे।
यहां बाबा साहब के भाई ने उन्हें गलत ठहराया, लेकिन तब भी बाबा साहब ने ये हवाला दिया कि गोलमेज सम्मेलन में न जाने से भारत के लाखों पुत्रों की बलि चढ़ा दी जायेगी.. आज रमाबाई की कोख उजड़ी है लेकिन कल को लाखों रमाबाई की कोख उजड़ जायेगी, जिसे वो ही रोक सकते है। ऐसा कह कर वो वहां से चले गए.. भाई की मौत और माता की वो दशा के कारण ही बाबा साहब के पुत्र यशवंत राव अंबेडकर मन ही मन बाबा साहब से नाराज रहने लगे थे। भारत के बाकि पिछड़ो औऱ दलितों के लिए अपने परिवार की अनदेखी थी उनकी पहली गलती।
दूसरी गलती- एक ब्राह्मण लड़की से शादी से शादी करना
1935 में रमाबाई की टीबी के कारण मौत हो गई थी, और बाबा साहब समय के साथ कई बीमारियों से ग्रसित हो गए थे, जिसके कारण वो मुम्बई में अपने मित्र डॉ एस एम राव के पास अक्सर जाते थे, जहां 1947 के शुरुआत में ही सविता अंबेडकर जो कि उस वक्त शारदा कबीर हुई करती थी, उनसे मुलाकात हुई थी। बाबा साहब सविता अंबेडकर की शख्सियत से काफी प्रभावित थी, और दोनो ने करीब 1 साल तक 40 से 50 पत्रो के जरिए बात की थी, जिसमें ज्यादातर बाबा साहब की सेहत को लेकर चिंता ही होती थी।
जिसने बाबा साहब को काफी प्रभावित किया औऱ बाबा साहब ने 15 अप्रैल 1948 को सविता अंबेडकर से विवाह कर लिया। लेकिन इस शादी से कोई खुश नहीं था क्योंकि सविता ब्राहमण जाति से थी, और बाबा साहब जिन ब्राह्मणी सोच के खिलाफ लड़ रहे थे, उसी कुल में शादी कर लेना उनकी बड़ी गलती मानी गई। उनके बेटे ने तो सविता अंबेडकर को कभी स्वीकार की ही नहीं किया.. वहीं बाबा साहब की मौत के बाद भी सविता अंबेडकर पर उनकी हत्या करने जैसा आरोप लगा था, हालांकि फिर उन्हें क्लीनचिट मिल गई थी। मगर एक ब्राह्मण लड़की से शादी के कारण दलितो क विश्वास जरूर डगमगा गया था।
तीसरी गलती- बाबा साहब का धर्म परिवर्तन करने का फैसला
हम सभी जानते है कि मरने से पहले बाबा साहब ने बौद्ध धर्म अपनाया था, लेकिन इसका फैसला उन्होंने 1935 में ही ले लिया था। बाबा साहब ने नासिक में जब ये ऐलान किया था तब महात्मा गांधी ने उन्हें समझाया था कि वो जनता के प्रतिनीधि है, और उनका इस तरह से भाषण देना नकारात्मक प्रभाव डालेगा, खबरो की सुर्खियों में भी यहीं था..
लेकिन बाबा साहब ने गाँधी जी की बातों का जवाब देते हुए कहा कि धर्म जरूरी है, लेकिन उससे चिपकना जरूरी नहीं है.. खासकर तब, जब आपका धर्म आपको इंसानो तो छोड़िये पशुओं के बराबर भी सम्मान नहीं देता.. ऐसा धर्म से चिपके रहने का कोई अर्थ नहीं है… और हिंदू धर्म ऐसा ही है..बाबा साहब जैसी शख्सियत का धर्म बदलना उनकी एक गलती माना गया.. जबकि बाबा साहब ने इस्लाम और ईसाई जैसी विदेशी धर्मो को नहीं अपनाया। बाबा साहब ने कहा था वो धर्म चाहते है धोखा और अंधविश्वास नहीं। मगर फिर भी उन्हें इसे बाबा साहब की गलती कहते है।
चौथी गलती- भारत को अपनी मातृभूमि न मानना
बाबा साहब ने बाकि के क्रांतिकारियों और स्वतंत्रा सेनानी भारत को अपनी मातृभूमि मानते थे तो वहीं बाबा साहब ने सीधे भारत को अपनी मातृभूमि स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। दलितो के समाज के बाहर का पहले ही दर्जा दिया हुआ था, ऐसे में बाबा साहब का ऐसा कहना आग में घी का काम करने वाला था। लेकिन बाबा साहब कांग्रेस, गांधी और नेहरू की नीतियो से काफी नाराज थे।
उन्होंने महसूस किया था कि सही मायनो में पिछड़ो और उनका अधिकार को कभी दिया ही नहीं गया था, वो हमेशा से ही शोषित थे, एक जमीन के टुकड़े को भी जो दलित अपना नहीं कह सकता फिर वो भूमि उनकी मातृ भूमि कैसे हो सकती है, लेकिन इस बात को कहीं न कहीं गलत तरीके से पेश किया गया… हो सकता है कि ऐसे कहने के पीछे बाबा साहब जमीन के टुकड़ो में भी अंश देने की बात कर रहे हो, लेकिन भारत को मातृभूमि न कहना उनके देशभक्त होने पर ही सवाल उठा गई।
पांचवी गलती- जब बाबा साहब ने व्हाइट हाउस का निमंत्रण ठुकराया
कह जाता है कि अगर बाबा साहब ने व्हाइट हाउस जाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया होता तो शायद दलितों की स्थिति को वो बहुत पहले बदलने में मदद कर पाते, लेकिन बाबा साहब ने सोचा कि उनके व्हाइट हाउस जाने से दलितो के बीच उनकी निष्ठा पर सवाल उठेंगे, इसलिए बाबा साहब ने निमंत्रण स्वीकार नहीं किया था.. और ये ही उनकी पांचवी गलती कह सकते है।
बाबा साहब ने अपने बेटे को अंतिम विदाई नहीं दी.. ताकि किसी और का बेटा न जाये, उन्होंने ब्राह्मण लड़की से शादी भी जातिगत भेदभाव के मुंह पर करारा तमाचा जड़ने के लिए की.. बाद में और कोई धर्म न अपना कर बौद्ध अपनाना भी बताता है कि वो भारतीय संस्कृति के प्रति कितने निष्ठावान रहे थे।
दलितों को जहां सम्मान नहीं मिलता वो स्थान आपका कैसे हो सकता है.. बाबा साहब ने कई सवाल उठाये.. कई कदम उठाये..जिसे उनकी गलतियां ठहराने की कोशिश तो काफी हुई, लेकिन जब आप उन गलतियों के पीछे का ध्येय देखेंगे तो पायेंगे कि बाबा साहब की ये गलतियां वकाई में उन्हें कितना महान बना गई। बाबा साहब की इन गलतियों पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बतायेँ।



