बाबा साहेब के 5 अधूरे सपने जिन्हें पूरा करना चाहते थे अंबेडकर, पर समय ने नहीं दिया साथ

Baba saheb, Ambedkar Vision
Source: Google

6 दिसंबर 1956 की सुबह भारतीय इतिहास में एक मनहूस खबर के साथ शुरु हुई थी… खबर आई कि दलितो के मसीहा, संविधान निर्माता, आजाद भारत के पहले कानून मंत्री बाबा साहब भीम डॉक्टर राव अंबेडकर साहब अब इस दुनिया में नहीं रहे.. देर रात सोते सोते ही उनका परिनिर्वाण हो गया था। इस खबर ने सबको झकझोर कर रख दिया था, एक ऐस शख्स जिसने न केवल दलितो और पिछड़ो के लिए लड़ाई लड़ी थी बल्कि भारत को तरक्की पर चलने के लिए एक मजबूत रास्ते के रूप में संविधान तैयार करके दिया था।

बाबा साहब को कई मुहाने पर जातिवादी ताकतो का विरोध झेलना पड़ा था.. यहीं विरोध एक कारण था जब उन्होंने संसद में कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था.. लेकिन क्या आप ये जानते है कि बाबा साहब की कुछ अधूरी इच्छायें भी थी.. जिन्हें वो पूरा करना चाहते थे। लेकिन उनकी अचानक हुई मृत्यु के कारण वो इच्छाएं हमेशा के लिए अधूरी रह गई। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि बाबा साहब की वो कौन सी 5 अधूरी इच्छा है जो अब भी अधूरी है।

दरअसल बाबा साहब अक्सर अपने मन की बात किताबो के जरिये ही कहा करते थे, किताबों से उनकी तुरंत गहरी दोस्ती हो जाया करती थी। लेकिन उनके मन में क्या चलता था वो उनके साथ रहने वाली उनकी पत्नी को भी समझ नहीं आता था। बाबा साहब की आकास्मिक मौत ने भारत को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। अगर वो जिंदा होते तो शायद कुछ औऱ बदलाव होते.. तो शायद आज के हालात भी कुछ अलग होते।

बाबा साहब की पहली अधूरी इच्छा

बाबा साहब ने जब संविधान का निर्माण किया था तब उसके लागू होने के बाद उन्हें संविधान में कई लूपहोल नजर आये..जिसमें वो प्रावधान करना चाहते थे..जिसमें सबसे पहला प्रावधान था राज्य समाजवाद का कानून बनाना। अपनी किताब “स्टेट्स एंड माइनारिटीज यानि राज्य और अल्पसंख्यक में राज्य समाजवाद के बारे में विस्तृत रूप से बात की है। उन्होंने उसमें लिखा कि वो कृषि और उद्योग को नीजि स्वामित्व के बजाय राज्य नियंत्रण में रखना चाहते है। जिसके तहत राज्य सरकार खेती की लागत खुद वहन करता, उद्योगो, उत्पादन के प्रमुख साधनो, औऱ नीजि संसाधनो पर राज्य सरकार को स्वामित्व देना था, जिससे पूंजीवादी शोषण खत्म होता और आर्थिक समानता आती।

साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और आवाज जैसी बेसिक सुविधाओ की देखरेख भी सरकार के हाथों में होता। इससे समाजिक कल्याण को बढ़ावा मिलता। वो जानते थे कि  निजी स्वामित्व में केवल नीजि लाभ पर ध्यान दिया जाता है, इसलिए सरकार के अधीन होना आवश्यक था, उन्होंने प्रस्ताव दिया था कि सरकार के पास जमीनो का स्वामित्व होने से सामूहिक रूप से खेती की जायेगी, राज्य सरकार ही किसानो को खेती के लिए बीज,खाद और मशीने मुहैया करायेगी.. ऐसा होता तो जातिवाद के मुंह पर करारा तमाचा लगता बेगारी बंधुआ मजदूरी खत्म होती.. इससे आर्थिक लोकतंत्र का जन्म होता.. सभी आर्थिक रूप से मजबूत होते लेकिन उस वक्त कांग्रेस के दवाब और विरोध के कारण बाबा साहब इस प्रावधान को नहीं कर सकें औऱ उनका सपना अधूरा रह गया।

दलितो को अलग निर्वाचन क्षेत्र न दिला पाना

2, दूसरा सपना -दलितो को अलग निर्वाचन क्षेत्र न दिला पाना- 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने ‘कम्युनल अवार्ड’ की घोषणा की तहत  दलितों को एक ‘अलग अल्पसंख्यक’ मानकर अलग निर्वाचन क्षेत्र देने की बाबा साहब की मांग मान ली थी, जिससे दलितो के पास दो मतदान का अधिकार होता लेकिन गांधी जी ने इसके खिलाफ आंदोलन कर दिया और हवाला दिया कि इससे हिंदू धर्म में बंटवारा और बढ़ जायेगा। बाबा साहब ने अपनी किताब What Congress and Gandhi Have Done to the Untouchables में पूना पैक्ट को लेकर लिखा है।

उन्होंने कहा कि गांधी जी कि दलितो के प्रति कोई खास सहानुभूति नहीं थी, लेकिन उनके अनशन और विरोध के कारण उन्हें निर्वाचन सीटे ज्यादा देकर उनकी स्वतंत्र पहचान’ छील ली गई। अब दलितो को सवर्ण हिंदुओ के हाथों की कठपुतली बन कर रहना होगा.. गांधी जी का अनशन असल में संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ एक नैतिक दबाव’ था। दलित कभी भी पूरी तरह से आजाद नहीं हो पायेंगे.. और न ही उनका प्रतिनीधि इतनी आसानी से मजबूत सवर्णो के बीच जगह बना पायेगा। अलग निर्वाचन क्षेत्र का बाबा साहब का सपना अधूरा रह गया।

प्रेस को आजाद मौलिक अधिकार में शामिल करना

3, तीसरा सपना-प्रेस को आजाद मौलिक अधिकार में शामिल करना- बाबा साहब जानते थे कि आज नहीं तो कल प्रेस का इस्तेमाल ताकतवर लोग अपने मतलब के लिए कर सकते है इसलिए वो प्रेस की आजादी को मौलिक अधिकारों में शामिल करना चाहते थे। बाबा साहब कहते थे कि प्रेस की आजादी लोकतंत्र के लिए सबसे अनिवार्य है। प्रेस को किसी के हाथों की कठपुतली बनाने के बजाय लोकतंत्र के रक्षक के रूप में बनाना चाहते थे, क्योंकि एक आजाद प्रेस ही सरकार की मनमानी औऱ तानाशाही पर रोक लगा सकती है और आम जनता की आवाज बन सकती है। लेकिन उस वक्त की तत्कालीन कांग्रेस की सरकार ने ऐसा करने नहीं दिया था। आज प्रेस की हर एक संस्था पर किसी न किसी ताकतवर व्यक्ति का प्रभाव है।

4- चौथा सपना- संविधान के अनुच्छेद 17 में बाबा साहब ने अस्पृश्यता यानि कि छुआछूत को खत्म करते हुए उसे कानून अपराध की श्रैणी में रखा था.. इस भेदभाव के लिए बाबा साहब मैला ढुलाई को सबसे बड़ा कारण मानते थे। बाबा साहब कहे थे कि घर धर ‘अंडरग्राउंड ड्रेनेज सिस्टम’ और आधुनिक शौचालयों होने के बाद ही मैला ढुलाई बंद की जा सकती है लेकिन उस वक्त भारत इतना विकास नहीं कर पाया था कि बाबा साहब के रहते हुए ये सपना पूरा हो सकें.. हालांकि अब ये प्रथा लगभग पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है, लेकिन बाबा साहब के रहते हुए ऐसा नहीं हो सका था.. जिसका उन्हें अफसोस था।

अंतिम किताब बुद्ध एंड हिज धम्मा

5, पांचवा सपना- बाबा साहब की मृत्यु अचानक हुई थी, उनकी मृत्यु के बाद उनकी अंतिम किताब बुद्ध एंड हिज धम्मा छपी थी जो नवयान बौद्ध परंपरा वालो के लिए उनकी पवित्र ग्रंथ के समान है। बाबा साहब अपने जीते जी इस किताब को प्रकाशित होते देखना चाहते थे। हालांकि ये किताब उनकी मृत्यु के करीब एक साल बाद 1957 में छापी गई थी। अपनी इस किताब को छपते हुए देखने का सपना बाबा साहब का अधूरा रह गया था। बाबा साहब जीवित रहते तो शायद और भी बड़े बदलाव जरूर होते.. उनका अचानक जाना असल मायने में दलितों को अधूरी मजबूती दे गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *