Dr. B.R. Ambedkar: बाबा साहब की दलीले हमेशा इतनी ताकतवर होती थी कि बड़े बड़े पढ़े लिखे लोगो की आंखे शर्म से नीचे झुक जाती थी, उन्होंने लंदन से वकालत पास की थी लेकिन वकालत की प्रेक्टिस उन्होंने भारत वापिस आकर शुरु की थी, बाबा साहब को 4 जुलाई 1923 को बार काउंसिल की तरफ से बार काउसिंल की मान्यता मिली थी..और 5 जुलाई से उन्होंने वकालत शुरु कर दी थी। लेकिन यहां भी उनती जाति सबसे बड़ी बाधा बनी। उनकी जाति के कारण उंची जाति के वकील हमेशा उनके भेदभाव करते थे, उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन बाबा साहब ने हमेशा इन सभी बातों की परवाह किये बिना न्याय के लिए आवाज उठाई थी।
जब कोर्ट रूम में गूँजी अंबेडकर की आवाज़
कहा तो ये भी जाता है कि कोर्ट में उन्हें बैठने के लिए कुर्सी नहीं दी जाती थी.. ताकि वो अपवित्र न हो जायें मगर इससे बाबा साहब ने घबराने के बजाये कोर्ट के बाहर ही एक चबूतरे पर अपना पड़ाव डाल दिया था, जिसके कारण उन्हें लोग चबूतरे वाला वकील कहने लगे थे, वो उसी चबूतरे पर बैठ कर दलित, कमजोर और जरूरतमंदो लोगो के लिए न्याय की लड़ाई लड़ते थे। बाबा साहब के पास अक्सर वो मामले ही आते थे जिन्हें लेने के लिए दूसरे वकील इंकार कर देते थे, या फिर उसमें जीतने के चांसेस न के बराबर होते थे। ऐसे में बाबा साहब की जिंदगी में कई मामले आये जब बाबा साहब की एक दलिल ने पूरे केस का रूख ही बदल दिया।
बाबा साहब के पास पहुँचा शंकर का परिवार
दरअसल ये किस्सा बाबा साहब के दिल के बेहद करीब स्थान महाराष्ट्र के सतारा का है, जहां शंकर नाम का एक गरीब दलित मजदूर गांव के ही जमींदार रघुपति राव पाटिल के यहां मजदूरी करता था, लेकिन जमींदार किसी बात पर शंकर से नाराज हो गया, और उसे काम से निकाल दिया.. यहां तक कि शंकर की मजदूरी देने के बजाय शंकर पर चोरी और हमला करने का आरोप लगा दिया.. पुलिस वालो ने भी जमींदार की बात सुनी और शंकर को जबरन बिना उसका पक्ष सुने जेल में कैद कर दिया गया। उन दिनो बाबा साहब पूरे राज्य में उन वकील के रूप में प्रचलित हो चुके थे जो गरीबों औप पिछड़ो की मदद मुफ्त में करते थे, बस फिर क्या था शंकर का परिवार भी मदद की गुहार लगाने पहुंच गया।
जब बाबा साहब ने चश्मदीद से पूछा सवाल
बाबा साहब ने मदद करने की बात की और केस अपने हाथ में लेकर कोर्ट की तरफ चल दिये। कोर्ट में बाबा साहब के सामने एक सवर्ण वकील था.. लेकिन बाबा साहब उससे घबराने के बजाय शांति से विपक्ष के वकील की दलील सुन रहे थे। चश्मदीद के बयान के आधार पर उसने रात के अँधेरे में शंकर को चोरी और हमला करते देखा था। जब विपक्षी वकील की दलीले खत्म हो गई तो बाबा साहब उठे उन्होंने चश्मदीद से पूछा कि जिस दिन ये हमला हुआ उस तारीख के हिसाब के वो अमावस्या की रात होनी चाहिए।
गवाह कुछ समझ नहीं पाया.. उसने बाबा साहब की बताई तारीख को फिर से दोहरा दिया.. बस फिर क्या था बाबा साहब ने दलील दी कि जिस जगह पर शंकर को देखे जाने की बात की जा रही है और चश्मदीद के अनुसार वो शंकर से करीब 50 मीटर की दूरी पर खड़ा था..
बाबा साहब कि एक दलील से बदला पूरा case
गवाह ने जब तब भी हामी भरी तो उन्होंने पूछा कि अमावस्या की रात में, जब सबसे ज्यादा घना अंधेरा था.. तब गवाह ने 50 मीटर की दूरी से शंकर को कैसे देख लिया.. जबकि को 10 मीटर भी दूर होगा तो बिना रोशनी के कुछ नहीं दिखेगा.. किसी को पहचानना तो दूर की बात है। बाबा साहब के इस एक दलील ने पूरे केस का रूख बदल दिया.. यहां दलित शंकर को न्याय मिला.. कोर्ट ने न केवल उसकी मजदूरी दिलवाई बल्कि जमींदार से मुआवजा भी दिलवाया। बाबा साहब केवल केस ही नहीं लड़ते थे, वो लोगो की मदद करने के लिए सदैव तत्पर रह थे।
बाबा साहब केवल एक समाज सुधारक, प्रोफेसर, अर्थशास्त्री ही नहीं थे, बल्कि उनी वकालत को टक्कर देने से लोग डरने लगे थे। बाबा साहब की दलीलो ने उन्हें समाज में काफी सम्मान दिलाया था। उन्होंने इसीलिए दलितो औफ पिछड़ो को शिक्षित होने के लिए प्रेरित किया क्योंकि वो जानते थे कि दलित पिछड़े अपने हक के लिए बहस तभी कर पायेंगे जब वो अपने अधिकारों को समझ पायेंगे.. जिसके लिए उनका शिक्षित होना सबसे पहले आवश्यक है। वेल बाबा साहब की बात के आप कितना इत्तेफाक रखते है।



