6 दिसंबर 1956 को सुबह 7 बजे के करीब बाबा साहब बिस्तर पर सोये हुए थे, जबकि वो हमेशा 6 बजे से पहले उठ जाते थे, उनके सहायक को थोड़ी हैरानी हुई.. तबियत खराब थी तो लगा शायद उठने में देर हो गई होगी..लेकिन जब पत्नी सविता अंबेडकर ने उन्हें उठाने की कोशिश की तो वो नहीं उठे, जिसके बाद उनके सहायक रत्तू ने उन्हें हिला कर उठाने का प्रयत्न किया लेकिन शरीर ठंडा पड़ा हुआ था और कोई हरकत नहीं हुई.. बाबा साहब दुनिया को अलविदा कह कर जा चुके थे, बाबा साहब के पलंग के बगल में उनकी अनपब्लिश किताब द बुद्धा एंड हिज धम्मा की पांडुलिपियां रखी थी।
अंबेडकर ने जवाहरलाल नेहरू से सरकारी अनुदान की अपील
जिसमें उन्होंने अंतिम बार इस किताब के इंट्रोडक्शन सेक्शन पर काम किया था..उनके रसोइए के मुताबिक बाबा साहब की तबीयत खराब थी और उन्होंने कम खाना खाया था, सोने से पहले उन्होंने किताब पर काम किया और बुद्धम शरणम गच्छामि गाया था। बाबा साहब ने दो महीने पहले ही बौद्ध धर्म अपनाया था, और वो चाहते थे कि उनकी किताब को वो खुद छपवायें, जिसके लिए अंबेडकर ने जवाहरलाल नेहरू से सरकारी अनुदान की अपील की थी, लेकिन नेहरू ने सीधा इस अपील को अस्वीकार कर दिया.. जिससे बाबा साहब जीते जी इस किताब को नहीं छपवा सकें। हालांकि उनकी मौत के बाद 1957 में ये किताब छाप दी गई, लेकिन तब तक इस किताब के साथ ऐसी छेड़छाड़ कर दी गई थी जिसका खुलासा बाद में हुआ.. इस बात में कितनी सच्चाई है.. जानेंगे सबकुछ डिटेल में..
मुम्बई स्थित सिद्धार्थ कॉलेज प्रकाशन
दरअसल बाबा साहब ने अपने जीवन में कई प्रमुख किताबे लिखी थी, जो केवल सामाजिक सुधार, आध्यत्मिक सुधार के लिए ही नहीं बल्कि देश को आर्थिक तौर पर मजबूत कैसे बनाया जाये, उनके बारे में भी बताया था, लेकिन जब बाबा साहब ने बौद्ध धर्म को जानना शुरू किया तब उन्होंने इस पर एक किताब लिखने का फैसला किया। इसी बीच 1951 में उन्होंने नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा देकर दिल्ली के शाम नाथ मार्ग में शिफ्ट हो गये।
जहां वो ज्यादातर समय बौद्ध धर्म के बारे में जानने और उसे समझने में लगाने लगे, इसी दौरान उन्होंने किताब लिखना शुरु किया। जिसे नेहरू की जलन के कारण वो अपने जीते जी छपना नहीं सकें थे, लेकिन उनके मरने के बाद मुम्बई स्थित सिद्धार्थ कॉलेज प्रकाशन ने 1957 में प्रकाशित किया था। ये किताब असल में भगवान बुद्ध के जीवन और उनके दर्शन के बारे में है, जिसे बाबा साहब द्वारा शुरू किये नवयान बौद्ध धर्म परंपरा की आधारशिला मानी गई।
किताब के साथ हुई छेड़छाड़
1957 में किताब के छपने से पहले बाबा साहब की पत्नी पर संगीन आरोप लगे कि उन्होंने बाबा साहब के बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार को रोकने के लिए उन्हें स्लो पॉइजन देकर मारा है.. जांच भी हुई, और जांच में सविता अंबेडकर निर्दोष साबित हुई, और किताह छाप दी गई। तब से इतिहासकारों और अंबेडकरवादी विचारधारा को फॉलो करने वालो के बीच मतभेद बना हुआ था कि किताब के मूल संदेश में बदलाव किये गये, वहीं किताब के कुछ अंशो में बड़े बदलाव किये गये या उन्हें हटा दिया गया। इतना ही नहीं किताब के विचारों को उस तरह से नहीं दिखाया गया जैसा कि बाबा साहब दिखाना चाहते थे। लेकिन सरकार और किताब छापने वाले प्रकाशन ने ऐसे किसी भी बदलाव से साफ इंकार कर दिया था मगर किताब के साथ छेड़छाड़ हुई।
बाबा साहब अपनी पत्नी को काफी एडमायर करते थे
इसका सबूत पहली बार मिला जब बंगाली बौद्ध लेखक भगवान दास ने इस प्रस्तावना को एक “दुर्लभ प्रस्तावना” के रूप में प्रकाशित किया था। जिसे किताब प्रकाशन करने वाली प्रेस से हटवा दिया गया था। इस प्रस्तावना में साफ लिखा था कि पत्नी सविता के आने से उनकी जिंदगी के 10 साल और बढ़ गए है। वो एक बेहतर नर्स की तरह उनका ख्याल रखती है.. वो बेहद जिम्मेदार महिला है। उनके कारण ही वो अपनी किताब को पूरा कर पायें थे, यानि की बात साफ थी बाबा साहब अपनी पत्नी को काफी एडमायर करते थे।
जो शायद उन्हें अस्वीकार करने वाले बाबा साहब के कुछ अनुयायियों और उनके परिवार को पसंद नहीं था.. शायद इसीलिए उनकी तारीफ में लिखे बाबा साहब के विचारों को काफी लंबे समय तक मीडिया के सामने ही आने नहीं दिया गया था। ये भी अफवाह उड़ी की 1990 में बाबा साहब की किताबों का अप्रकाशित हिस्सा न छापने के लिए किताब प्रकाशित करने वाली समिति पर दवाब बनाया था, जिसे लेकर कई दलित संगठन ने पुरजोर विरोध किया था। बाबा साहब की अंतिम किताब को जीते जी नहीं छपवा सकें थे, लेकिन दुख की बात तो ये है कि उनकी किताब छपी भी तो कई बदलावों के साथ जो इस किताब के साथ कभी पूर्ण न्याय नहीं कर सकें।



