हम सभी जानते है कि बाबा साहब ने शिक्षा हासिल करने के लिए बचपन से ही अनगिनत संघर्ष किये है, जातिगत भेदभाव की चोट उनके व्यक्तित्व पर ऐसी पड़ी थी, कि वो आजीवन इससे संघर्ष करते रहे। उन्होंने हिंदू धर्म में जातिवाद के कारण चिढ़ से हिंदू धर्म को छोड़ कर बौद्ध धर्म अपनाया था.. वो अपनी पढ़ाई के लिए अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में भी गए जहां उन्होंने पहली बार जातिगत भेदभाव से आजाद खुली हवा में सांस में लिया था। उन्होने पहली बार महसूस किया था कि छुआछूत से हटकर समानता औऱ सम्मानता की जिंदगी कैसी होती है।
अपनी मिट्टी और समाज के प्रति अटूट जिम्मेदारी
हालांकि स्कॉलरशिप रूकने के कारण उन्हें भले ही वापिस आना पड़ा.. लेकिन वो फिर से ब्रिटेन गए थे और पढ़ाई पूरी करके लौट आये… एक सवाल जरूर आपके भी मन में आता होगा कि बाबा साहब इतने काबिल थे, उन्होंने 32 डिग्रियां हासिल की थी, उन्होंने वकालत की, प्रोफेसर बने.. लेकिन इन सब के बाद भी बाबा साहब ने वापिस भारत में ही बसने का फैसला क्यों किया.. जबकि वो तो किसी भी संपन्न देश में बस सकते थे, गरीबी औऱ लाचारी से जीवन जीने के बजाये एशो आराम की जिंदगी भी जी सकते थे..लेकिन ऐसा क्यों नहीं किया बाबा साहब ने चलिए इस लेख में जानते है।
बाबा साहब ने दलितों और पिछड़ो के लिए आवाज उठाई
बाबा साहब भीम राव अंबेडकर एक ऐसी शख्शियत थे, जो हमेशा अपनी जमीन अपनी मातृभूमि से जुड़े रहे… लेकिन अगर आप उन्हें एक देशभक्त कहते है तो इसमें थोड़ा विचार करने की जरूरत है। क्योंकि एक तरफ जहां महातत्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे स्वतंत्रता सेनानी देश को अंग्रेजो की गुलामी से निकालना चाहते थे, गुलामी से आजाद कराने के लिए आंदोलन कर रहे थे, तो वहीं बाबा साहब कभी भी किसी स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा नहीं बने। उन्होंने जब भी उन्हें मंच से बोलने का मौका मिला, उन्होंने दलितों और पिछड़ो के लिए ही आवाज उठाई थी।
जातिगत औऱ सामाजिक समानता
उन्होंने कभी भी गुलामी से आजादी को लेकर कोई चर्चा नहीं की.. कई मुद्दों पर उन्होंने अंग्रेजो की खिलाफत भी नहीं की थी.. इसीलिए हम ये तो नही कह सकते है कि देश से प्यार के कारण उन्होंने देश में रहने का फैसला किया होगा.. जब आप सही मायने में बाबा साहब के व्यक्तित्व को समझेंगे तो पायेंगे कि उन्होंने सही मायने में हमेशा कमजोर पिछड़े और गरीब तबके के लोगो के लिए ही आवाज उठाते रह थे, इसमें शूद्र, पिछड़े, दलित, और महिलाएं सभी शामिल थी। बाबा साहब मानते थे कि ब्राह्मणवादी सोच के काऱण केवल दलित पिछड़े ही पीड़ित नहीं है बल्कि समाज की महिलाएं भी शोषित है, इसलिए उन्हें देश की आजादी से ज्यादा जातिगत औऱ सामाजिक समानता प्रिय लगी थी.. और उन्होंने उसके लिए ही संघर्ष किया था।
गुरु ज्योतिबा फूले सबसे बड़ी प्रेरणा
क्यो नहीं बसे दूसरे देश में अब सवाल ये है कि बाबा साहब किसी दूसरे देश में भी बस सकते थे तो वो फिर भारत में ही रह कर इस कुरीति का सामना क्यों करते रह थे। जवाब बिल्कुल साफ है.. बाबा साहब को शिक्षा के क्षेत्र में जो मौका मिला वो सबको नही मिल सकता था, लेकिन उनका पूरा समाज प्रताड़ना जरूर झेल रहा था। ऐसे में बाबा साहब ने केवल अपने भले के लिए सोचने के बजाय समाज में बड़ा बदलाव लाने का फैसला किया। उनके लिए उनके गुरु ज्योतिबा फूले सबसे बड़ी प्रेरणा थे, जिन्होंने अपने दम पर महिलाओं की शिक्षा के लिए लंबा संघर्ष किया और जीत भी हासिल की थी, इसलिए बाबा साहब को भी यकीन था कि किसी को तो इस लड़ाई की शुरुआत करनी होगी.. तो ये लड़ाई बाबा साहब ने ही शुरु की। हालांकि ये लड़ाई महिला शिक्षा की तरह नही थी।
बाबा साहब ने हिंदू धर्म को त्यागा
इसमें एक बड़े तबके से लड़ने था.. जो जातिवाद को मानता था.. इसमें केवल पुरुष वर्ग ही नहीं बल्कि महिलाएं बच्चे सभी शामिल थी। ऐसे में पूरे समाज की सोच बदलना आसान नहीं था.. इसलिए बाबा साहब के तमाम संघर्ष के बाद भी वो उस बदलाव को नहीं ला पाये थे जिसकी उन्होंने कल्पना की थी.. वो धीरे धीरे समझ गए थे कि जिस चीज को बदला नहीं जा सकता उसे छोड़ देना ही अच्छा होता है। और इसीलिए बाबा साहब ने हिंदू धर्म, जातपात का भेदभाव.. सबकुछ त्याग दिया। वो खुद तो अलग हुए ही उन्होंने समाज के एक बड़े तबको को भी अलग होने की प्रेपणा दी.. ये बदलाव आज भी ऐतिहासिक है।
जो शायद तब मुम्किन नहीं होता अगर बाबा साहब विदेश में जाकर बस जाते.. तब शायद हमारे देश को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संविधान भी न मिलता। बाबा साहब ने केवल हवा में दावे नहीं किये,, केवल दिखावे के लिए शोर शराबा नही मचाया..बल्कि सहीं मायने में सामाजिक बदलाव के लिए काम किया है, और शायद इसीलिए बाबा साहब को देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। बाबा साहब का देश छोड़ कर न जाना भारत के लिए सबसे बड़े गौरव की बात है। आपकी इस पर क्या राय है।


