Buddhism in Myanmar: क्या आपने कभी सोचा है कि जहां बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रसार प्रचार हो, जहां की करीब 90 प्रतिशत जनता बौद्ध धर्म का पालन करती है, वहां भी गृह युद्ध और अशांति हो सकती है, लेकिन कई बार चंद गैर बौदध लोगो की हिंसक प्रवृति का असर पूरे देश में अशांति और हिंसा कैसे फैलाता है इसका जीता जागता उदाहरण है भारत का ही एक पड़ोसी देश म्यांमार.. जिसे कभी बर्मा के नाम से भी जाना जाता था। जो कभी भारत की ही एक हिस्सा माना जाता था, लेकिन जहां भारत महायान बौद्ध परंपरा को प्रमुखता दी गई वहीं म्यांमार में थेरवाद परंपरा का बोलबाला हो गया।
विपश्यना ध्यान का एक वैश्विक केंद्र बन चुका असल मे दुनिया का तीसरा सबसे आबादी वाला बौद्ध देश है, लेकिन फिर भी यहां भिक्षुओ के बीच आपस में होने वाली झड़प के कारण म्यांमार की स्थिति इस वक्त काफी खराब हो गई है. अपने इस वीडियो में हम म्यांमार में बौद्ध धर्म के आने और उसके विस्तार की कहानी को जानेंगे, साथ ही कैसे यहां थेरवाद की परंपरा मजबूत हुई औऱ कैसे बन गया म्यांमार विपश्यना ध्यान का प्रमुख केंद्र.. और अभी के समय में म्यांमार में कैसी है बौद्ध धर्म को मानने वालो की स्थिति।
म्यांमार के बारे में जानकारी
म्यांमार, जिसे पुराने लोग बर्मा के नाम से ही जानते है.. आज भी ज्यादातर म्यांमार कहने के बजाये बर्मा कहना पसंद करते है…म्यांमार जिसकी आबादी 55,770,232 के पास है, ये आकड़े 2022 में जारी हुए थे, इन आकड़ो के अनुसार करीब 90 से 91 प्रतिशत की आबादी यानि की करीब 4.8 करोड़ लोग बौद्ध धर्म को फॉलो करती है और वो भी थेरवाद बौद्ध धर्म को.. म्यांमार एक ऐसा देश है जहां बौद्ध भिक्षुओं को सबसे ज्यादा सम्मान दिया जाता है, यहां तक कि म्यांमार विपश्यना ध्यान यानि की अंतदृष्टि ध्यान का एक वैश्विक केंद्र है.. यहां बौद्ध धर्म राजधर्म के रूप में जाना जाता है।
म्यामांर में बौद्ध धर्म की शुरुआत
जब आप म्यांमार में बौद्ध धर्म के आने और उसके फलने फूलने की बात करते है तो ये 11 वी सदी में सक्रिय रूप से म्यांमार की धरती पर फलने फूलने लगा. तब यहां के राजा बागान राजवंश के राजा अनवरहता थे जिन्होंने भिक्षु शिन का मार्गदर्शन पाकर पूरी निष्ठा और दृढ़ता से बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया.. भिक्षु शिन थेरवाद परंपरा के अनुयायी थे और राजा ने भी उनकी परंपरा का पालन किया और म्यांमार में थेरवाद परंपरा को ही बढ़ावा दिया। लेकिन साक्ष्यों के आधार पर ये भी कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने तीसरी सदी में दो भिक्षुओं सोना और उत्तरा को कई भिक्षुओं और पवित्र ग्रंथो के साथ सुवन्नभूमि यानि की सोने की भूमि पर भेजा था।
तीसरी सदी में म्यांमार तक पहुचा बौद्ध धर्म
जिसे अभी का थाटन या थाईलैंड का निकोन माना जा सकता था। चीनी ग्रंथ लियू यांग राज्य के मुताबित तीसरी सदी में लोग बौद्ध धर्म को ही फॉलो करने लगे थे। यानि की तीसरी सदी में म्यांमार तक बौद्ध धर्म पहुंच गया था। यहां मिले ग्रंथ जो कि पांचवी छठी शताब्दी के आसपास के है, वो आंध्र-कुंतला -पल्लव क्षेत्र की लिपी से मिलते है जो सबूत है कि म्यांमार में पहली बार बौद्ध धर्म दक्षिण भारत से गया होगा। 11 सदी में थेरवाद के साथ साथ महायान परंपरा को भी कुछ हद तक फॉलो किया जाता था. लेकिन 19वी सदी आते आते यहां पूरी तरह से बौद्ध धर्म सक्रिय हो गया। शुद्ध थेरवाद परंपरा।
थेरवाद परंपरा की बढ़ती लोकप्रियता
थेरवाद परंपरा इसलिए भी प्रचलित ही क्योंकि इसमें वैराग्य को बढ़ावा देने के बजाय केवल तप करने की भूमिका को महत्व दिया जाता है..म्यांमार में थेरवाद परंपरा का मानने के साथ कई बौद्ध भिक्षु 37 आधिकारिक नटो यानि की पवित्र आत्माओं की साधना करते है, जो एकीकृत पूर्व बौद्ध जीववाद का प्रतीक है। ये संसारिक मामलो में हस्तक्षेप करने वाली आत्मायें कहलाती है। वहीं विपश्यना को बढ़ावा देने में महासी सयादाव और सयागी यू बा खिन की बनाई परंपरा का ज्यादा महत्व देखा गया है। थेरवाद परंपरा की बढ़ती लोकप्रियता के कारण म्यांमार आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ी बौद्ध आबादी वाला देश कहलाता है। यहां की राजनीति हो या फिर आम सामाजिक जीवन सबमें मठवासी शिक्षा आम है, और समुदायिक जीवन के केंद्र में है।
बर्मी प्रथागत कानून
म्यांमार में पैगोडा और बौद्ध मंदिरो को काफी महत्व दिया जाता है जो कि अनिगनत संख्या में मौजूद है लेकिन श्वेदागोन पैगोडा जो कि यांगोन में स्थित है, पूरे म्यांमार में सबसे अहम पैगोडा है, जो पूरे देश के मंदिरो औऱ पैगोडा का संचालन करता है। म्यांमार के संविधान में भी बौद्ध धर्म को विशेष महत्व दिया गया है। बौद्ध भिक्षु जहा रहते है उसे संघ कहा जाता है और उनका म्यांमार की राजनीति, आर्थिक और धार्मिक फैसलों में काफी अहम स्थान माना जाता है। आपको जानकार हैरानी होगी कि म्यांमार एक ऐसा देश है जो बौद्ध भिक्षुओ को अपनी जीडीपी का एक अच्छा खासा खर्च करता है।
यहां रहने वाले बौद्ध अनुयायि मुख्य रूप से बमर, शान, रखाइन, मोन, करेन औऱ चीनी में पाये जाते है। यहां बौद्ध धर्म को बर्मी प्रथागत कानून द्वारा संचालित किया जाता है। विपश्यना के अलावा यहां दूसरा अभ्यास पुण्य कर्म भी काफी अभ्यास किया जाता है। इसके अलावा वेइजा अभ्यास भी होता है हालांकि उसे वो पहचान नहीं मिली जो बाकि दोनो अभ्यास को मिले।
बौद्ध राष्ट्रवादी वागौंग के पूर्णिमा के दिन को “राजधर्म दिवस के रूप में मनाते है, जिसे 26 अगस्त 1961 से शुरु किया गया जब “संविधान के तीसरे संशोधन का 1961 का अधिनियम किया गया था। यहां होने वाला पगोडा उत्सव, ‘श्वेडागोन पगोडा’ का उत्सव जैसे कई उत्सव है जिसे देखने के लिए लाखों लोग आते है। ये उत्सव फरवरी मार्च और अप्रैल के महीने में होते है। म्यांमार एक ऐसा देश है जहां बौद्ध धर्म और बौदध भिक्षुओ को बहेद सम्मान की दृष्टि के देखा जाता है.. और शायद यहीं कारण है कि म्यांमार अशांति के बाद भी अपने अस्तित्व से अलग नहीं हुआ।



