Bokaro news: साहब, अभी सांसें चल रही हैं! झारखंड के इस दलित बुजुर्ग की कहानी सुनकर पसीज जाएगा आपका दिल

Jharkhand news, Caste discrimination with Dalit
Source: Google

Bokaro news: हाल ही में झारखंड से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहाँ एक बुजुर्ग दलित व्यक्ति अपने हाथों में अपने ही अस्तित्व का प्रमाण लिए घूम रहा है और गुहार लगा रहा है, “मुझे मृत घोषित न करें.” इतना ही नहीं सरकारी अधिकारियो ने उनकी वृद्ध पेंशन भी रो दी है जिसके कारण उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है.

Also Read: संसद की ओर इशारा आखिर क्या कहती है बाबा साहब की उठी हुई ऊँगली? जानिए इसके पीछे का असल सच

सरकारी फाइलों में दलित बुजुर्ग को बनाया मुर्दा

क्या अब दलितों को सक्रिय सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा? क्या उन्हें जीवित होते हुए भी मृत घोषित कर दिया जाएगा? क्या सरकारी व्यवस्था इतनी हद तक बिगड़ चुकी है कि अब वह दलितों के अधिकारों को भी कुचल देगी? जी हाँ ऐसा ही कुछ झारखण्ड के बुजुर्ग दलित व्यक्ति के साथ हुआ है… जी हाँ बुजुर्ग कहता है कि “साहब मैं जिंदा हूं, मुझे कागजों में मत मारिए!” ये शब्द है 83 साल के धरनीधर मांझी के, जो झारखंड (Jharkhand) के बोकारो (Bokaro) के रहने वाले हैं. वो सांसें तो ले रहे है, लेकिन सरकारी फाइलों में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है..

बुजुर्ग की पेंशन बंद कर दी

दरअसल, यह मामला बोकारो का है. दामुडीह पंचायत (Damudih Panchayat) के धरनीधर मांझी को 2021-22 में वृद्धावस्था पेंशन मिलनी रही थी. लेकिन 2022-23 के एक Verification ने सबकुछ बदल दिया. पंचायत स्तर पर रिपोर्ट आई कि धरनीधर मांझी अब इस दुनिया में नहीं रहे, और बस…एक झटके में एक बुजुर्ग की पेंशन बंद कर दी गई..आरोप है कि मुखिया, पंचायत सचिव और आंगनबाड़ी कर्मियों की एक गलत रिपोर्ट ने जिंदा इंसान को कागजों में मार डाला.

Also Read: Saharanpur news: बस्ती बचाने ढाल बनकर खड़े हुए आजाद, समर्थकों ने कहा बाबा साहब के बाद दूसरे मसीहा

बुजुर्ग महीनो से डीसी ऑफिस के चक्कर लगा रहे

पेंशन बंद होने के बाद से ये बुजुर्ग पिछले कई महीनों से ब्लॉक और डीसी ऑफिस (DC Office) के चक्कर काट रहे हैं, सिर्फ ये साबित करने के लिए कि वो अभी मरे नहीं हैं….इस पूरे मामले में हेमंत सोरेन ने भी संज्ञान लिया है. उन्होंने X के जरिए बोकारो के उपायुक्त को निर्देश दिया है कि मामले की जांच कर पीड़ित की मदद सुनिश्चित की जाए और उन्हें इसकी जानकारी दी जाए…ये सिर्फ धरनीधर मांझी की कहानी नहीं है,  ये उस भ्रष्ट और लापरवाह सिस्टम का चेहरा है  जहाँ एक बुजुर्ग को खुद के जीवित होने का सबूत देने के लिए दर-दर भटकना पड़ता है. सवाल ये है क्या मुख्यमंत्री के आदेश के बाद सिस्टम अपनी गलती सुधारेगा, क्या उन अधिकारियों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने ये गलत रिपोर्ट दी..क्या आपको लगता है डिजिटल इंडिया के दौर में ऐसी गलतियां माफ करने लायक हैं?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *